एक दौर होता है जब आप फसलें बोते चलते हैं, तरह-तरह के पेड़ लगाते चलते हैं। उस दौर में आपको लगता है आप जो चाहें कर सकते हैं। आपके ऊपर अंकुश लगा सके, ऐसी कोई शक्ति है नहीं। प्रकृति तब चुप बैठी रहती है। वह आगे बढ़कर आपको यह बताती नहीं कि आप कितनी बड़ी नासमझी कर रहे हैं। आसपास के इंसान समझाने की कोशिश करें भी तो आप उनकी नहीं सुनते।
धीरे-धीरे दौर बदलता है। फसलें बोने, पेड़ लगाने का समय बीत जाता है। अब वक्त होता है उन फसलों के कटने का, पेड़ों के फल देने का। अब आपके सामने विकल्प नहीं रहता। आपको वही फसलें काटनी पड़ती हैं जैसा आप बहुत पहले लगा चुके होते हैं। आपके सिर पर वही फल टपकते हैं जो आपके लगाए पेड़ दे सकते हैं।
हम सबके साथ ऐसा होता है। शहंशाहों, तानाशाहों के साथ भी ऐसा ही होता है। चूंकि उनके पास ताकत ज्यादा होती है, इसलिए वे पेड़ भी ज्यादा लगाते हैं। और अगर लगाते समय सतर्क न रहे तो फिर फल भी उसी अनुपात में ज्यादा झेलने पड़ते हैं उन्हें। अगर किसी शहंशाह ने विषवृक्ष बोए हैं तो आखिरी दौर में उसके चारों तरफ गिरते फल विष ही फैलाते हैं, उसका सांस लेना दूभर बनाते हैं। वह कितना भी चाहे कि उसका बगीचा रंग-बिरंगे फूलों और तरह-तरह की खुशबुओं से भरा रहे, होता यह है कि बगीचे की हवा अधिक से अधिक जहरीली होती जाती है।
मजबूरी यह कि इस जहर भरी हवा से बचने के लिए वह महल छोड़कर जा भी नहीं सकता। महल उसकी ऐसी कमजोरी बन चुका होता है जिससे छुटकारा पाना उसके लिए मुमकिन नहीं होता। महल में घुसने और यहां बने रहने के लिए ही तो उसने सारे धतकरम किए होते हैं। इसे कैसे छोड़ दे।
यह जरूर होता कि उसकी बढ़ती घुटन और उस घुटन से उपजी बेचैनी ज्यादा लोग महसूस नहीं कर पाते। असल में, शहंशाहों की आदत होती है, अपना सुख वे बाजे-गाजे के साथ मनाते हैं, दूसरों को उस सुख से सुखी होने को और न हों तब भी ऐसा दिखाने को मजबूर करते हैं, लेकिन अपना दुख औरों के साथ नहीं बांटते। डर होता है कि उन्हें कमजोर न मान लिया जाए। सो, अपनी घुटन, अपनी बेबसी, अपनी लाचारी वे सबसे छिपाए रखना चाहते हैं।
हालांकि जैसे इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते, वैसे ही दुख-तकलीफ, लाचारी-बेबसी भी अभिव्यक्ति की कोई न कोई राह तलाश ही लेती है। ज्यादातर यह व्यक्त होती है शहंशाह के फैसलों में, उसके उठाए कदमों में। बुद्धि, विवेक, समझदारी का तकाजा होता है ईरघाट की ओर बढ़ना, लेकिन उसके कदम बढ़ते हैं वीरघाट की ओर। वह खुद को बताता है सबसे बड़ा लोकसेवक, लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक, लेकिन कर्मों का प्रताप कहिए कि डर उसे सबसे ज्यादा लोगों से ही होता है। लोग उसके करीब आने की कोशिश करते हैं और वह अपने चारों ओर दीवारें बड़ी करता जाता है ताकि चाहकर भी लोग उसके पास न पहुंच सकें।
अपने इस डर को वह मीठी-मीठी बातों से ढकने की कोशिश करता है, लेकिन ऊंची होती दीवारें उसकी घबराहट की पोल खोलती रहती हैं।
क्या इन दिनों दिख रही दिल्ली की किलेबंदी भी कुछ राज फुसफुसा रही है आपके कानों में?
(रेखाचित्र एआई की मदद से)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं और यूट्यूब चैनल @dhoop_chhaanv चला रहे हैं।)